एस्टोनिया के ₹769 करोड़ के हथियार सौदे में भारतीय कंपनी का नाम, भारत के रक्षा मंत्रालय ने किया लेन-देन से इनकार
नई दिल्ली। यूक्रेन के लिए गोला-बारूद की खरीद से जुड़े एस्टोनिया के करीब 7 करोड़ यूरो यानी लगभग 769 करोड़ रुपये के विवाद ने यूरोप के रक्षा खरीद तंत्र के साथ-साथ भारत में भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विवाद में भारतीय कंपनी Neco Defence Munitions का नाम इसलिए सामने आया है क्योंकि उसने 2024 में इटली में पंजीकृत Datasel S.R.L. का अधिग्रहण किया था। हालांकि भारत के रक्षा मंत्रालय ने सोमवार को स्पष्ट किया कि Neco Defence का मंत्रालय या भारतीय सशस्त्र बलों के साथ कोई कारोबारी संबंध या सप्लाई ऑर्डर नहीं है।
मामला 2024 में शुरू हुआ, जब एस्टोनिया के Centre for Defence Investments (RKIK) ने Datasel के साथ तोप के गोले खरीदने के लिए समझौते किए। रिपोर्टों के अनुसार, अगस्त 2024 में करीब 1.5 करोड़ यूरो और अक्टूबर में लगभग 1 करोड़ यूरो का अग्रिम भुगतान किया गया। इसके बाद अतिरिक्त समझौते हुए और कुल अग्रिम भुगतान करीब 7 करोड़ यूरो तक पहुंच गया। इस खरीद के लिए यूरोपीय संघ की European Peace Facility से मिलने वाली धनराशि का इस्तेमाल किया गया था।
विवाद तब बढ़ा जब निर्धारित समय पर गोला-बारूद की आपूर्ति नहीं हो सकी। एस्टोनिया का कहना है कि निरीक्षण में उपलब्ध सामग्री आवश्यक गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी और कुछ आपूर्ति अधूरी थी। इसके बाद एस्टोनिया ने अनुबंध से जुड़े विवाद को अदालत और मध्यस्थता प्रक्रिया तक पहुंचाया। करीब 60 से 70 मिलियन यूरो की रकम फिलहाल इस विवाद से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया में फंसी हुई बताई जा रही है।
इस पूरे मामले में एक अहम सवाल यह भी उठा कि इतने बड़े हथियार सौदे के लिए जिस कंपनी को चुना गया, उसके पास पहले इस तरह के तोप के गोले बेचने का पर्याप्त रिकॉर्ड नहीं था। एस्टोनिया की ओर से यह स्वीकार किया गया कि यूक्रेन के लिए तत्काल गोला-बारूद उपलब्ध कराने की जरूरत के कारण सामान्य से अधिक जोखिम लिया गया था। बाद में यही जोखिम विवाद का प्रमुख मुद्दा बन गया।
हालांकि Datasel ने एस्टोनिया के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। कंपनी का कहना है कि उसने अनुबंध के तहत पर्याप्त मात्रा में सामग्री उपलब्ध कराई थी और देरी का एक कारण विभिन्न देशों से आवश्यक मंजूरियां, नियामकीय प्रक्रियाएं और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन थीं। कंपनी ने खुद को इस विवाद में पीड़ित बताया है और एस्टोनिया के खिलाफ प्रतिदावा किए जाने की बात भी सामने आई है। इसलिए फिलहाल इसे साबित हुआ धोखाधड़ी का मामला कहना उचित नहीं होगा।
विवाद का राजनीतिक असर एस्टोनिया में काफी बड़ा रहा। रक्षा क्षेत्र में वित्तीय प्रबंधन और खरीद प्रक्रिया को लेकर ऑडिट में सवाल उठने के बाद रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर ने इस्तीफा दे दिया और राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार की। एस्टोनिया की राष्ट्रीय ऑडिट रिपोर्ट में रक्षा खरीद से जुड़े अनुबंधों की निगरानी, क्रियान्वयन और प्राप्त सामान की जांच को लेकर कमियां सामने आने की बात कही गई है।
भारत के लिए इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि भारतीय रक्षा मंत्रालय ने Neco Defence से किसी सरकारी रक्षा सौदे या सप्लाई से इनकार किया है। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, कंपनी ने भारतीय सशस्त्र बलों को कोई आपूर्ति नहीं की है और मंत्रालय के साथ उसका कोई लेन-देन नहीं है। इसलिए एस्टोनिया के इस विवाद को भारत सरकार के रक्षा सौदे या भारतीय सेना की खरीद से जोड़कर देखना फिलहाल तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
फिलहाल पूरा मामला कानूनी और मध्यस्थता प्रक्रिया में है। एस्टोनिया का दावा है कि उसे तय गुणवत्ता और समय के अनुरूप गोला-बारूद नहीं मिला, जबकि Datasel इन आरोपों को चुनौती दे रही है। ऐसे में अंतिम जिम्मेदारी किसकी है और अग्रिम भुगतान की रकम का क्या होगा, इसका फैसला कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। इस विवाद से फिलहाल जो सबसे बड़ा सवाल उठता है, वह है—युद्धकालीन जरूरतों के बीच रक्षा खरीद में कितने जोखिम लिए जाएं और बड़े अग्रिम भुगतान से पहले सप्लायर की क्षमता की जांच कितनी कठोर होनी चाहिए।







