श्रीनगर। कश्मीर घाटी में एक बार फिर कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। घाटी में सरकारी नौकरी कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को कथित धमकी मिलने के बाद कुछ कर्मचारियों के सुरक्षित स्थानों पर चले जाने की खबरों ने 1990 के दशक की यादें ताजा कर दी हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल के नाम से एक कथित धमकी-पत्र सामने आया है। इसमें घाटी में पुनर्वास योजना के तहत सरकारी नौकरी पाने वाले कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाने की धमकी दी गई है। रिपोर्टों में ऐसे कर्मचारियों की संख्या करीब 9 हजार बताई गई है। हालांकि इस पत्र की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
रिपोर्टों के मुताबिक, धमकी सामने आने के बाद कुछ कश्मीरी पंडित कर्मचारी अपने निर्धारित आवास से निकलकर सुरक्षित स्थानों पर चले गए हैं। कुछ कर्मचारियों के घर से काम करने की व्यवस्था किए जाने की भी जानकारी सामने आई है। ऐसे घटनाक्रम ने सरकार की उस पुनर्वास नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके तहत कश्मीरी पंडितों को घाटी में वापस लाने के लिए सरकारी नौकरियां और आवास उपलब्ध कराए गए थे।
कौन है यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल?
यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल का नाम हाल के दिनों में कश्मीर में सामने आए कथित आतंकी नेटवर्क के संदर्भ में चर्चा में आया है। सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के हवाले से प्रकाशित कुछ रिपोर्टों में इसे लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े कथित फ्रंट के रूप में बताया गया है। जुलाई में अनंतनाग में एक पुलिसकर्मी की हत्या के मामले में भी इस नाम से जिम्मेदारी लेने का एक अपुष्ट दावा सामने आया था। पुलिस इस संगठन के बारे में जांच कर रही है।
हालांकि संगठन की वास्तविक संरचना, नेतृत्व और उसके आतंकी संगठनों से संबंधों को लेकर आधिकारिक स्तर पर पूरी तस्वीर अभी साफ नहीं है। यही वजह है कि धमकी-पत्र की प्रामाणिकता और उसके पीछे मौजूद लोगों की पहचान की जांच सुरक्षा एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण हो गई है।
1990 की याद क्यों ताजा हुई?
कश्मीरी पंडितों का घाटी से बड़े पैमाने पर विस्थापन 1990 के दशक की शुरुआत में आतंकवाद और लक्षित हिंसा के दौर में हुआ था। उस समय धमकियों, हत्याओं और भय के माहौल के कारण बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित परिवार घाटी छोड़कर जम्मू और देश के दूसरे हिस्सों में चले गए थे।
इसके बाद केंद्र सरकार ने कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी और पुनर्वास के लिए विभिन्न योजनाएं शुरू कीं। प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित युवाओं को सरकारी नौकरियां दी गईं। कई कर्मचारियों के रहने के लिए घाटी में अलग आवासीय परिसर भी बनाए गए।
लेकिन अब यदि इन्हीं कर्मचारियों को धमकियों के कारण अपने आवास छोड़ने पड़ रहे हैं तो इससे पुनर्वास प्रक्रिया की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
दूरदराज के इलाकों में तैनात कर्मचारियों की अलग परेशानी
घाटी के दूरदराज और संवेदनशील इलाकों में नियुक्त कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण रही है। कई कर्मचारियों ने सरकारी आवास उपलब्ध नहीं होने या सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण होटल, सराय अथवा निजी किराये के मकानों में रहने की व्यवस्था की थी।
ऐसे कर्मचारियों के लिए नौकरी के साथ-साथ सुरक्षित आवास सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। धमकियों की खबरों के बाद यह सवाल और गंभीर हो गया है कि क्या उन्हें ऐसे स्थानों पर तैनात किया जाना चाहिए जहां उनकी सुरक्षा को लेकर लगातार खतरा बना हुआ है।
बीबीसी की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम दो ऐसे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों का पता लगाया गया है जिन्होंने अपनी जान को खतरा बताते हुए सुरक्षित स्थान पर चले जाने की बात कही है। रिपोर्ट में इन कर्मचारियों की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है।
हालांकि बीबीसी की रिपोर्ट में सामने आए धमकी-पत्र की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि पत्र वास्तव में किस संगठन ने जारी किया और उसमें लिखी धमकियों को कितना गंभीर एवं वास्तविक खतरा माना जाना चाहिए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कश्मीरी पंडित कर्मचारियों और उनके आवासीय इलाकों में सुरक्षा बढ़ाई है। कुछ कर्मचारियों को अस्थायी तौर पर घर से काम करने की अनुमति दिए जाने की भी रिपोर्ट है।
फारूक अब्दुल्ला ने भी जांच की मांग की
नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने कथित धमकी-पत्र की गहन जांच की मांग की है। उन्होंने पत्र की प्रामाणिकता को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि मामले की सच्चाई सामने आनी चाहिए, ताकि बिना पुष्टि के डर और अफवाह का माहौल न बने।
अनुच्छेद 370 हटने के बाद शांति का दावा
केंद्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधानों को हटाने के बाद घाटी में सुरक्षा स्थिति में सुधार और आतंकवाद पर नियंत्रण को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में गिनाया है। सरकार का दावा रहा है कि इसके बाद जम्मू-कश्मीर में हालात तेजी से सामान्य हुए हैं।
लेकिन आतंकवादी घटनाएं और लक्षित हमले पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। ऐसे में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को मिली कथित धमकी सरकार के सामने एक बार फिर सुरक्षा और पुनर्वास दोनों से जुड़ा सवाल खड़ा करती है।
क्या फिर शुरू हो रहा है पलायन?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि कश्मीरी पंडितों का 1990 जैसा सामूहिक पलायन फिर शुरू हो गया है। उपलब्ध जानकारी मुख्य रूप से कथित धमकी-पत्र और उसके बाद कुछ कर्मचारियों के सुरक्षित स्थानों पर जाने से जुड़ी है।
लेकिन यदि धमकी वास्तविक साबित होती है और बड़ी संख्या में कर्मचारी घाटी छोड़ने लगते हैं तो यह सरकार की पुनर्वास नीति के लिए गंभीर झटका हो सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल के नाम से जारी धमकी के पीछे कौन है और क्या यह किसी बड़े आतंकी नेटवर्क की नई रणनीति का हिस्सा है? फिलहाल इसका जवाब सुरक्षा एजेंसियों की जांच पर निर्भर है।







