श्रीगंगानगर। नगर परिषद के दो वार्डों—36 और 34—के चुनाव इस बार शहर की राजनीतिक चर्चाओं में खासे महत्वपूर्ण बने हुए हैं। इन दोनों वार्डों में भाजपा ने क्रमश: महेश सारस्वत और बबीता अरोड़ा को प्रत्याशी बनाया है। इन दोनों प्रत्याशियों के प्रचार अभियान में उद्योगपति मुकेश शाह की सक्रियता भी चर्चा का विषय बनी हुई है।
मुकेश शाह को श्रीगंगानगर के प्रमुख उद्योगपतियों और कॉलोनी विकसित करने वाले कारोबारियों में गिना जाता है। शहर के विकास को लेकर उनके और रविशंकर गुप्ता के प्रयासों की चर्चा भी होती रही है। आधुनिक तकनीक और नियोजित विकास को ध्यान में रखकर कॉलोनियों के विकास की दिशा में किए गए प्रयासों को उनके समर्थक सकारात्मक उदाहरण के रूप में देखते हैं।
वर्तमान नगर परिषद चुनाव में शाह की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि वार्ड 36 के भाजपा प्रत्याशी महेश सारस्वत और वार्ड 34 की भाजपा प्रत्याशी बबीता अरोड़ा के लिए वे स्वयं प्रचार करते दिखाई दे रहे हैं। शाह अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में दोनों प्रत्याशियों के लिए मतदाताओं से समर्थन मांग रहे हैं। महेश सारस्वत के प्रचार क्षेत्र में रिद्धि सिद्धि प्रथम तथा बबीता अरोड़ा के प्रचार क्षेत्र में रिद्धि सिद्धि द्वितीय प्रमुख क्षेत्र बताए जा रहे हैं।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि दोनों प्रत्याशियों को भाजपा का टिकट दिलाने में मुकेश शाह की भूमिका रही है। हालांकि टिकट वितरण में उनकी भूमिका को लेकर भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक विस्तृत पुष्टि सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है। इसलिए इसे राजनीतिक चर्चा के रूप में ही देखा जाना उचित होगा।
शाह की राजनीतिक सक्रियता का एक और पहलू है। वे स्वयं भविष्य में विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से टिकट के दावेदार होने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं। पार्टी संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनके संबंधों को लेकर भी राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा होती रही है। यदि भविष्य में वे विधानसभा चुनाव के लिए अपनी दावेदारी रखते हैं तो वर्तमान नगर परिषद चुनाव में उनकी सक्रिय भूमिका को उसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में भी देखा जाएगा।
यहीं से एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा होता है—क्या किसी संभावित विधानसभा दावेदार को नगर परिषद के केवल दो वार्डों के चुनाव में इतनी सक्रियता दिखानी चाहिए थी?
यदि मुकेश शाह ने महेश सारस्वत और बबीता अरोड़ा के समर्थन में चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी स्वीकार की है तो उनके लिए यह केवल दो वार्डों का चुनाव नहीं रह जाता। दोनों प्रत्याशियों की जीत या हार से उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक छवि और प्रभाव को भी जोडक़र देखा जा सकता है। खासकर तब, जब यह चर्चा हो कि दोनों प्रत्याशियों के चयन में उनकी भूमिका रही है।
यदि वे अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहते थे तो क्या उन्हें पूरे शहर के स्तर पर व्यापक भूमिका नहीं निभानी चाहिए थी? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विधानसभा की राजनीति नगर परिषद के एक-दो वार्डों से कहीं अधिक व्यापक होती है। शहर के सभी वर्गों और सभी क्षेत्रों में अपनी स्वीकार्यता बनाना किसी भी संभावित विधानसभा दावेदार के लिए अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
दूसरी ओर, यह भी तर्क दिया जा सकता है कि स्थानीय स्तर पर किसी प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करना राजनीतिक कार्यकर्ता और समर्थक के रूप में सामान्य गतिविधि है। हर चुनाव में नेता और प्रभावशाली लोग अपने पसंदीदा प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार करते हैं। इसलिए केवल दो वार्डों में सक्रिय होने को राजनीतिक गलती मानना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन यदि मुकेश शाह की भविष्य की राजनीति विधानसभा चुनाव को केंद्र में रखकर आगे बढ़ती है, तो नगर परिषद के इन दोनों वार्डों का परिणाम उनके लिए एक राजनीतिक परीक्षा जरूर बन सकता है। दोनों प्रत्याशियों का प्रदर्शन जितना मजबूत होगा, उतना ही उनके समर्थक इसे शाह के प्रभाव की सफलता के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं। वहीं यदि परिणाम उम्मीद के अनुरूप नहीं आते तो राजनीतिक विरोधियों को सवाल उठाने का अवसर मिल सकता है।
अंतत: सवाल यह नहीं है कि मुकेश शाह को महेश सारस्वत और बबीता अरोड़ा के लिए प्रचार करना चाहिए था या नहीं। सवाल यह है कि यदि वे अपनी राजनीतिक पहचान को शहरव्यापी स्तर पर स्थापित करना चाहते हैं तो क्या उन्हें अपनी सक्रियता का दायरा केवल दो वार्डों तक सीमित रखना चाहिए था?
नगर परिषद चुनाव का परिणाम आने के बाद यह तस्वीर कुछ हद तक स्पष्ट होगी कि दो वार्डों में शाह की सक्रियता ने कितना असर डाला और दोनों प्रत्याशियों का चुनावी प्रदर्शन कैसा रहा। इसके बाद ही यह आकलन संभव होगा कि यह रणनीति उनके लिए राजनीतिक रूप से कितनी लाभकारी साबित हुई।
श्रीगंगानगर नगर परिषद चुनाव: दो वार्डों में उद्योगपति मुकेश शाह की सक्रियता से बढ़ी राजनीतिक चर्चाएं
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