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वाशिंगटन। भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत और भारतीयों को शुभकामनाएं दीं, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई अलग बधाई संदेश सामने नहीं आया। ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और ट्रंप के व्यक्तिगत संबंधों को दोनों देशों के रिश्तों की मजबूती का आधार बताया जाता रहा है, राष्ट्रपति स्तर पर संदेश की अनुपस्थिति ने कूटनीतिक हलकों में सवाल खड़े किए हैं।
रूबियो ने अपने संदेश में भारत-अमेरिका संबंधों को ‘पहले से अधिक मजबूत’ बताते हुए कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत संबंधों ने दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने रक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष और वाणिज्य सहित कई क्षेत्रों में दोनों देशों के सहयोग का उल्लेख किया।
लेकिन सवाल रूबियो के संदेश से ज्यादा उस संदेश का है जो नहीं आया।
भारत-अमेरिका संबंधों को पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक साझेदारी के रूप में लगातार प्रस्तुत किया गया है। प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की मुलाकातों तथा दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत समीकरण को भी इस रिश्ते की विशेषता के तौर पर रेखांकित किया जाता रहा है। ऐसे में भारत के राष्ट्रीय पर्व पर अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से सार्वजनिक शुभकामना संदेश का सामने नहीं आना राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है।
फिर भी मोदी-ट्रंप रिश्ते के संदर्भ में राष्ट्रपति की चुप्पी को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। खासकर तब, जब अमेरिकी विदेश मंत्री स्वयं अपने संदेश में ट्रंप और मोदी के व्यक्तिगत संबंधों का उल्लेख कर रहे हों।
यही वह बिंदु है जहां भारत की विदेश नीति को लेकर राजनीतिक सवाल खड़े होते हैं। यदि दोनों देशों के बीच संबंध इतने मजबूत हैं कि अमेरिकी विदेश मंत्री उन्हें ‘पहले से अधिक मजबूत’ बता रहे हैं, तो क्या राष्ट्रपति स्तर पर भारत के राष्ट्रीय पर्व पर एक सार्वजनिक संदेश अपेक्षित नहीं था? और यदि ऐसा संदेश जानबूझकर नहीं दिया गया, तो उसके पीछे केवल प्रोटोकॉल है या बदलते अमेरिकी रणनीतिक हित?
ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से अलग संदेश का अभाव दोनों देशों के रिश्तों पर तत्काल संकट का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से एक राजनीतिक सवाल पैदा करता है।
भारत में प्रधानमंत्री मोदी लंबे समय से ट्रंप को अपना मित्र बताते रहे हैं। ट्रंप और मोदी के व्यक्तिगत संबंधों को भारत-अमेरिका संबंधों की मजबूती के महत्वपूर्ण पहलू के रूप में भी पेश किया जाता रहा है। रूबियो के ताजा संदेश में भी इसी व्यक्तिगत समीकरण का उल्लेख होना इस बात को और महत्वपूर्ण बना देता है।
अब सवाल यह है कि क्या ट्रंप की चुप्पी महज संयोग है या अमेरिकी विदेश नीति के बदलते प्राथमिकताओं का संकेत?
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भारत के स्वतंत्रता दिवस पर अमेरिका की ओर से संदेश आया जरूर, लेकिन वह राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से नहीं बल्कि विदेश मंत्री मार्को रूबियो की ओर से आया। और यही अंतर इस बार भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर नई बहस का आधार बन गया है।
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