31 views
इस्लामाबाद। तुर्कीये और सउदी अरब के साथ मक्का समझौता होने के उपरांत पाकिस्तान का मीडिया अपनी विदेश नीति और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की प्रशंसा के गीत गा रहा है। मक्का समझौता नाटो का ही एक रूप है।
नाटो के सदस्य देश एक देश पर किये गये हमले को अपने देश पर किये गये हमले के समान समझते हैं और अफगानिस्तान, ईराक सहित कई स्थानों पर अमेरिका के नेतृत्व में कार्यवाही की गयी हैं।
मक्का समझौता को भारत के लिए चुनौति के रूप में देखा जा रहा है और इसको भारतीय विदेश नीति की कूटनीतिक हार के तौर पर देखा जा रहा है। एक तरफ समझौता हुआ तो दूसरी ओर चीन भी सक्रिय हो रखा है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तत्कालीन सउदी शासक सलमान बिन अब्दुल अजीज अल सउद ने 2016 में 3 अप्रेल को सरकारी यात्रा के दौरान अपने सर्वोच्च सम्मान दिया था और यह रॉयल कोर्ट में कार्यक्रम हुआ था किंतु जब सामरिक समझौता की बारी आयी तो सउदी पाकिस्तान की तरफ चला गया। इस्लामाबाद की सेना भी सउदी के बॉर्डर पर तैनात है।
इससे पता चलता है कि 2016 और 2026 में कितना अंतर आ चुका है। 10 सालों में सउदी अरब ने अपनी विदेश नीति में बदलाव किया है।
पाकिस्तान के मध्यपूर्व में बढ़ते प्रभाव को फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की ताकत के रूप में प्रदर्शित किया गया है। जनरल मुनीर को अनेक विदेशी शक्तियों का हाथ सिर पर रखा हुआ है। इस कारण वे सर्वोच्च अधिकारी हैं। राष्ट्रपति से भी उनको बड़ा पद दिया गया है, उन पर पाक सुप्रीम कोर्ट के नियम या कानून भी लागू नहीं होते हैं। संसद में यह प्रस्ताव पारित हुआ है।
एक तरफ मक्का समझौता है तो दूसरी ओर चाइना के अरुणाचल प्रदेश की सीमा से लगते इलाकों में अपनी सेना को सक्रिय किये जाने के समाचार मिले हैं। रॉयटर और द प्रिंट समाचार पत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि अरुणाचल प्रदेश में तनाव है। बुधवार को विदेश मंत्रालय ने भी कहा है कि दोनों हिमालयी सीमा वाले देशों के बीच संबंध संतुलित होने चाहिये।
तीसरी तरफ अमेरिका है जिसने विदेश नीति को घुटनों पर ला दिया है। अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट में बिल पास हो गया है और रूस से तेल की खरीद पर 100 प्रतिशत टैरिफ का प्रावधान किया गया है।
बांग्लादेश की तरफ से भी नयी चुनौतियां मिल रही हैं। भारत के भीतर सीजेपी के उदय के साथ ही भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता को काफी बड़ा सदमा लगा है।
इस तरह से सरकार को भीतर और बाहरी क्षेत्र से चुनौतियां मिल रही हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 3 सितंबर को अमेरिका जा रहे हैं और अगले माह उनका ब्रिक्स सम्मेलन के तहत नई दिल्ली के दौरे का कार्यक्रम बन रहा है। अगर सीमा पर तनाव रहता है तो संभव है कि शी भारत दौरे पर नहीं आयें और अपने किसी प्रतिनिधि को भेज दें। ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में वांग यी नहीं आये थे।
इस तरह के प्रारूप के समाचार पाकिस्तान मीडिया चला रहा है और भारत की विदेश नीति पर सवाल उठा रहा है।
📧 Sandhyadeep Newsletter
नई और महत्वपूर्ण खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाएं।
Subscribe करने के बाद confirmation email आएगा।








