श्रीगंगानगर। भारतीय मूल के कनाडा नागरिक प्रेम वत्सा को भारत सरकार ने 2020 में पदमश्री अवार्ड दिया था और बदले में आईडीबीआई बैंक को वत्सा की कंपनी ने खरीद लिया। यह भी ध्यान में रखने योग्य बात है कि भारत सरकार और एलआईसी ने एक ही दिन में 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी बेचने का निर्णय लिया। इसको कहते हैं मोदी है तो मुमकिन है। आगे और भी उदाहरण मिलेंगे, जिससे यह सौदा चर्चा में आ गया है।
नरेन्द्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी का एलान किया था और 2017 आते-आते आईडीबीआई और केरल का कैथोलिक साइरेन बैंक (सीएसबी बैंक) भारी वित्तीय परेशानी में फंस गये। यह देखिये कि प्रेम वत्सा की कंपनी ने दोनों बैंकों को खरीद लिया। इसको कहते हैं कि मोदी है तो मुमकिन है।
प्रेम वत्सा कौन हैं?
प्रेम वत्सा भारतीय मूल के कनाडा नागरिक हैं। उनका जन्म 1950 में हैदराबाद में हुआ था और उन्होंने आईआईटी मद्रास से 1971 में कैमिकल इंजीनियरिंग में उच्च शिक्षा प्राप्त की। कनाडा से एमबीए की शिक्षा प्राप्त की और फिर वहीं पर अपना कैरियर स्थापित किया। उन्होंने फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग नामक कंपनी की स्थापना की।
पदम्श्री कैसे मिला?
कनाडा का नागरिक होने के नाते प्रेम वत्सा विदेशी नागरिक हो गये। भारत सरकार ने 2020 में उनको पदम्श्री अवार्ड से सम्मानित करने का एलान किया और 2022 में उन्होंने राष्ट्रपति से इस सम्मान को प्राप्त किया। इससे पहले वे केरल के सीएसबी बैंक की 51 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदकर उसका नाम सीएसबी रख चुके थे।
सीएसबी और आईडीबीआई की खरीद
सीएसबी और आईडीबीआई को एक ही कंपनी ने खरीद है जिसका नाम फेयरफैक्स फायनेंशियल होल्डिंग है। ध्यान रहे कि दोनों ही बैंक 2017 में भारी वित्तीय समस्या का सामना करने वाले बैंक थे। आईडीबीआई को उस समय भारत सरकार और एलआईसी ने सहारा दिया और दोनों ने 100 प्रतिशत मालिकाना हक प्राप्त कर लिया।
सीएसबी को 2017 में खरीद करने की चर्चा हुई और 2018 में कंपनी ने दावा किया कि उसके पास 51 प्रतिशत हिस्सेदारी है। 12 सौ करोड़ का निवेश होने की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई। फेयरफैक्स फायनेंशियल होल्डिंग का 2016 में टर्नओवर मात्र 63 हजार करोड़ के आसपास था। कनाडा की कंपनी ने भारत में निवेश किया था और फिर पदमश्री का अवार्ड देने का एलान 2020 में किया गया तो उस समय कंपनी का टर्नओवर 1.48 लाख करोड़ रुपये हो चुका था। चार सालों के भीतर दोगुणा से भी ज्यादा तेजी देखने को मिली। खैर 2022 में कंपनी को पंख लग चुके थे और टर्नओवर 2.2 लाख करोड़ का हो चुका था। 2024 आते-आते कंपनी ने अन्य क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई और टर्नओवर 3.16 लाख करोड़ रुपये हो गया। इस बात को बहुत ही ध्यान से समझने की आवश्यकता है कि 8 नवंबर 2016 तक कंपनी का टर्नओवर 63 हजार करोड़ रुपये था और 8 सालों के भीतर कंपनी का राजस्व कई गुणा बढ़ चुका था।
आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत खरीदी
भारत सरकार और एलआईसी के पास आईडीबीआई का मालिकाना हक था और 14 अक्टूबर 2016 बुधवार को दोनों सहमत हो गये कि आईडीबीआई की हिस्सेदारी कनाडा के वॉरेन बुफेट कहे जाने वाले प्रेम वत्सा की कंपनी को बेच दी जाये। एलआईसी ने 30.24 तथा भारत सरकार ने 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी बेच दी। इस तरह से 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी फेयरफैक्स फायनेंशियल होल्डिंग नामक कंपनी को बेच दी गयी। प्रति शेयर 81 रुपये रखा गया। हालांकि 27 फरवरी 2026 को इस बैंक का प्रति शेयर भाव 116 रुपये था।
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि सरकारी उपक्रम आईडीबीआई के पास वित्तीय समस्या नहीं थी किंतु बैंक को बेचकर सरकार ने अपना खजाना भरना था और इस कारण बैंक की हिस्सेदारी 52 हजार 878 करोड़ में यह सौदा किया गया।
रिजर्व बैंक असमंजस में?
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास इस समय तकनीकी समस्या आ गयी है। एक कंपनी के पास दो बैंकों की हिस्सेदारी नहीं हो सकती और सीएसबी बैंक की हिस्सेदारी प्रेम वत्सा के पास 40 प्रतिशत होने की जानकारी दी गयी है। अब रिजर्व बैंक दोनों बैंकों के विलय सहित अन्य बिंदुओं पर विचार कर रहा है।
अधिकारी विरोध में उतरे
सरकारी बैंक को एक दिन के भीतर ही प्राइवेट कर दिया गया और अब इसका विरोध भी हो रहा है। बैंक अधिकारियों ने अपने भविष्य से संबंधित सवाल सरकार के समक्ष रखे हैं। इससे पहले सरकार ने एलआईसी के शेयर ही गुपचुप तरीके से 6.5 प्रतिशत बेच दिये थे और इससे 31 हजार रुपये जुटाये। सरकार अपने बजट में ही सरकारी उपक्रमों को बेचकर धन जुटाने का प्रावधान करती आ रही है जबकि 2014 के समय कहा गया था कि ‘देश को बिकने नहीं दूंगा।’ अब सरकारी उपक्रमों को बेचा जा रहा है।
प्रेम वत्सा की कंपनी फेयरफैक्स को बेची गई आईडीबीआई बैंक की 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी
103 views



