नई दिल्ली। दिल्ली के भीतर जो अघोषित आपातकाल लागू कर दिया गया है, उससे दुनिया भर में आंदोलन की चर्चा हो रही है, लेकिन हैरानी करने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट कहां है? वह चुप कैसे है? क्या यह संवैधानिक संस्था भी तोता बन गयी है?
नई दिल्ली में दर्जनों रेलगाडिय़ों का संचालन बंद हो गया। मैट्रो की सेवाएं स्थगित कर दी गयी। युवाओं को जंतर मंतर पर पहुंचने से रोकने के लिए सशस्त्र बल तैनात किये गये। सडक़ों पर कीलें बिछा दी गयीं। बिना अपराध के युवाओं को गिरफ्तार कर थानों में ले जाया गया। कवरेज कर रहे पत्रकारों को हिरासत में ले लिया गया। यह आपातकाल नहीं है तो क्या है?

इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में अपना कार्यालय होने के बावजूद चुप है? अगर वर्तमान हालात को देखकर यह कहा जाये कि सुप्रीम कोर्ट के लिए यह कानूनसम्मत है, तो गलत नहीं होगा। अगर सर्वोच्च न्यायालय को यह आभास हो रहा होता कि जो परिस्थितियां पैदा की गयी हैं, वह असामान्य है तो निश्चित रूप से न्यायाधीश भय के दौर से बाहर आकर कोई निर्णय अवश्य लेते।
चीन में 80 के दशक में इसी तरह का आंदोलन हुआ था। छात्र भ्रष्टाचार के विरोध, राजनीतिक सुधार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग कर रहे थे। अप्रैल 1989 में शुरू हुए प्रदर्शन धीरे-धीरे बड़े आंदोलन में बदल गए। 20 मई को बीजिंग में मार्शल लॉ लागू किया गया और जून की शुरुआत में सेना ने कार्रवाई की। इस घटना को तियानमेन चौक नरसंहार के नाम से जाना जाता है। यह आधुनिक चीन के इतिहास की सबसे विवादास्पद और संवेदनशील घटनाओं में से एक है।
भारत में बिना मार्शल लॉ लागू किये बिना ही युवाओं की आवाज को कुचलने की कोशिश की गयी और उनको पुलिस थानों में उठाकर ले गयी। विभिन्न मीडिया हाउस ने हजारों लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 1975 के आपातकाल को लोकतंत्र की हत्या करार देते हैं तो आज जो कुछ हुआ है या हो रहा है, वह कौनसा लोकतंत्र की मर्यादा को शिखर पर ले जाने वाला है।
विदेशी अखबारों ने क्या कहा?
वैश्विक घटनाओं पर नजर रखने वाली प्रमुख पत्रिका द गार्जियन ने लिखा, सरकार विरोधी प्रदर्शन को रोकने के प्रयास में भारतीय अधिकारियों ने दिल्ली में सख्त लॉकडाउन लगा दिया है और युवाओं के नेतृत्व वाले कॉकरोच आंदोलन के नेता सहित हजारों लोगों को हिरासत में लिया है।
भारत भर से हजारों लोगों को प्रदर्शन में शामिल होने से रोक दिया गया था, जिसे कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने भारत की मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटाने की प्रक्रिया के विरोध में बुलाया था।
इसी तरह से रॉयटर ने भी आंदोलन को अपने पहले पेज पर हैडलाइन के रूप में उद्धत किया है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे को लेकर अपनी बेबाक राय रखी है।
बीबीस वल्र्ड ने भी अपनी प्रमुख हैडलाइन दिल्ली आंदोलन को बनाया है और युवाओं को हिरासत में लेती तस्वीरों से घटना के संबंध में जानकारी दी है।



