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नई दिल्ली। भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में अपनी हिस्सेदारी के करीब 6 प्रतिशत शेयर बेचकर लगभग 31 हजार करोड़ रुपये जुटाये हैं। शेयरों की यह बिक्री 4 से 6 अगस्त के दौरान ऑफर फॉर सेल (OFS) के माध्यम से की गयी। खास बात यह रही कि पूरी प्रक्रिया को बेहद शांत तरीके से अंजाम दिया गया, जिससे बाजार से जुड़े कई लोगों, सहयोगी संस्थाओं और ट्रेडर्स को भी इसकी भनक तक नहीं लगी।
एलआईसी में सरकार की हिस्सेदारी घटाने के फैसले को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। बीमा कंपनी से जुड़े कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि हिस्सेदारी बिक्री के माध्यम से धीरे-धीरे बड़े कॉरपोरेट समूहों को एलआईसी में हिस्सेदारी बढ़ाने का रास्ता तैयार किया जा रहा है। कर्मचारी संगठनों ने इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बरते जाने की मांग की है।
एलआईसी लंबे समय से आम भारतीयों के बीच भरोसे का नाम रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह कंपनी का सरकारी स्वामित्व और देशभर में फैला मजबूत नेटवर्क माना जाता है। करोड़ों पॉलिसीधारकों ने एलआईसी पर इसलिए भरोसा किया कि यह सरकारी उपक्रम है और बीमा दावों के भुगतान के मामले में भी इसकी मजबूत प्रतिष्ठा रही है।
ऐसे में सरकार द्वारा अपनी हिस्सेदारी में इतनी बड़ी कटौती किये जाने से यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या एलआईसी के सरकारी चरित्र को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है? कर्मचारी संगठनों का कहना है कि सरकार को हिस्सेदारी बिक्री के उद्देश्य, खरीदारों की प्रकृति और इससे आम पॉलिसीधारकों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को सार्वजनिक करना चाहिए।
वहीं, सरकार की ओर से हिस्सेदारी बिक्री को विनिवेश प्रक्रिया के तहत उठाया गया कदम माना जा रहा है। हालांकि, बिक्री की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के कारण एलआईसी के भविष्य में सरकार की भूमिका और कंपनी के स्वामित्व ढांचे को लेकर बहस तेज हो गयी है।
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