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पाक धीरे-धीरे कैसे बढ़ा रहा अपनी सामरिक शक्ति?

प्रकाशित: 8 Aug 2026, 8:54 PMअपडेट: 8 Aug 2026, 8:54 PMपढ़ने का समय: 4 मिनट
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नई दिल्ली/इस्लामाबाद। भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण बने हुए हैं। इसी बीच पाकिस्तान की तुर्किये और सऊदी अरब के साथ बढ़ती नजदीकी ने भारत की सुरक्षा और विदेश नीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए हालिया रणनीतिक समझौते को इस्लामाबाद अपनी सामरिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देख रहा है।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति तैय्यप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच हुए समझौते में आपसी सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने पर सहमति बनी है। पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की मौजूदगी ने भी इस समझौते के सामरिक महत्व को और बढ़ा दिया।

समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी एक पक्ष के खिलाफ होने वाली सैन्य आक्रामक कार्रवाई को तीनों देशों की सुरक्षा के लिए चुनौती माना जा सकता है। इससे पाकिस्तान को पश्चिम एशिया की दो महत्वपूर्ण शक्तियों के साथ सुरक्षा सहयोग का नया आधार मिला है।

बांग्लादेश पर भी नजर
इस घटनाक्रम के बीच बांग्लादेश की बदलती विदेश और रक्षा नीति भी भारत के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ढाका पिछले कुछ समय से विभिन्न देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने और आधुनिक हथियारों की खरीद पर जोर दे रहा है। बांग्लादेश और अमेरिका के बीच सैन्य अभ्यास तथा रक्षा सहयोग में बढ़ती सक्रियता भी इसी बदलाव का संकेत मानी जा रही है।
हालांकि, बांग्लादेश के भविष्य में पाकिस्तान के साथ किसी औपचारिक सुरक्षा समझौते में शामिल होने की संभावना को फिलहाल केवल एक रणनीतिक अनुमान के रूप में ही देखा जा सकता है। यदि दक्षिण एशिया में ऐसे सुरक्षा गठजोड़ आगे बढ़ते हैं तो इसका सीधा असर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर पड़ सकता है।
भारत के सामने बढ़ती चुनौती
पाकिस्तान की तुर्किये और सऊदी अरब के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारी तथा बांग्लादेश की बदलती कूटनीतिक दिशा ने भारत के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। आलोचकों का कहना है कि भारत को केवल घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देने के बजाय क्षेत्र में अपनी रणनीतिक पहल को और मजबूत करना होगा।
इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बातचीत की।

फिलहाल भारत सरकार की ओर से पाकिस्तान-सऊदी अरब-तुर्किये समझौते को लेकर कोई बड़ी सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आयी है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह समझौता केवल आपसी सुरक्षा सहयोग तक सीमित रहता है या आने वाले समय में इसका दायरा बढ़ता है।
यदि दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया में पाकिस्तान के नेतृत्व में नए रणनीतिक समीकरण आकार लेते हैं तो भारत के लिए चुनौती केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसे पूरे क्षेत्र में अपने कूटनीतिक और सामरिक प्रभाव को मजबूत करने की आवश्यकता होगी।
नाटो का भी सदस्य है तुर्किये
तुर्किये नाटो का भी सदस्य देश है। पश्चिमी यूरोप के ब्रिटेन, जर्मन, फ्रांस, इटली, वैश्विक महाशक्ति अमेरिका, पड़ोसी सदस्य देश कनाडा भी इसके मेम्बर हैं। इन सभी देशों की वार्षिक बैठक भी आयोजित होती है और हाल ही में तुर्किये में यह सम्मेलन आयोजित हुआ था। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वयं इसमें भाग लिया था।
पाकिस्तान को मिल रहा सहयोग
तुर्किये पाकिस्तान को अपनी तकनीक मुहैया करवा रहा है और हाल ही में एफ 16 जेट को उन्नत बनाने में अपना सहयोग दिया। इसके अतिरिक्त अन्य सामरिक हथियार तैयार करने में भी सहयोग कर रहा है। यह भारत सरकार के लिए चिंता का कारण हो सकता है और इन तथ्यों को नजरांदाज नहीं किया जाना चाहिये।

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