श्रीगंगानगर। क्या जल संसाधन विभाग के अधिकारी बिना दबाव के काम नहीं करते? किसानों के इस सवाल को मौजूदा हालात ने एक बार फिर हवा दे दी है। वर्षों से गंगनहर के पानी की चोरी और पंजाब क्षेत्र में लगी अवैध पाइपलाइनों को लेकर किसानों द्वारा शिकायतें और लिखित आग्रह किए जाते रहे, लेकिन विभाग की कार्रवाई कथित तौर पर कागजों से आगे नहीं बढ़ी। अब जिला मुख्यालय पर किसानों ने विशाल धरना शुरू किया तो विभाग अचानक सक्रिय हो गया है।
किसानों के आंदोलन के बाद जल संसाधन विभाग के अधिकारी पिछले दो दिनों से पंजाब क्षेत्र में गश्त कर रहे हैं और वर्षों से लगी अवैध पाइपों को जब्त करने की कार्रवाई की जा रही है। खास बात यह है कि विभाग की इस कार्रवाई की जानकारी लगातार सरकारी प्रवक्ता के माध्यम से जारी की जा रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जो पाइपलाइनें विभाग को वर्षों तक नजर नहीं आईं, वे आंदोलन शुरू होते ही अचानक कैसे दिखाई देने लगीं?
किसानों का कहना है कि गंगनहर में पानी के उतार-चढ़ाव और अवैध रूप से पानी उठाने को लेकर विभागीय अधिकारियों को कई बार मौखिक और लिखित रूप से अवगत कराया गया। यदि समय रहते इन शिकायतों पर गंभीरता से कार्रवाई की जाती तो किसानों को आंदोलन का रास्ता क्यों अपनाना पड़ता?
आंदोलन हुआ तो कार्रवाई शुरू : किसानों ने जिला मुख्यालय पर धरना देकर विभाग और प्रशासन पर दबाव बनाया तो अब अवैध पाइपों की धरपकड़ शुरू हो गई है। यही घटनाक्रम विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या किसानों की आवाज सुनने के लिए आंदोलन जरूरी है? क्या लिखित शिकायतों का कोई महत्व नहीं रह गया है?
विभाग की कार्रवाई से यह भी सवाल उठ रहा है कि यदि अवैध पाइपें वर्षों से लगी हुई थीं तो अब तक संबंधित अधिकारियों ने इनकी पहचान कर कार्रवाई क्यों नहीं की?
गंगनहर में बढ़ा पानी, किसानों को मिली राहत : आंदोलन के बीच गंगनहर में पानी की मात्रा में भी बढ़ोतरी हुई है। इससे किसानों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन किसानों का कहना है कि यह राहत स्थायी होनी चाहिए। केवल आंदोलन के दौरान कार्रवाई करने के बजाय विभाग को नियमित रूप से गंगनहर और इससे जुड़े क्षेत्रों की निगरानी करनी चाहिए।
किसानों का स्पष्ट कहना है कि जल संसाधन विभाग को दबाव में नहीं, जिम्मेदारी के तहत काम करना चाहिए। यदि विभाग शिकायत मिलने के बाद तत्काल कार्रवाई करे, अवैध पाइपलाइनों पर लगातार नजर रखे और पानी की चोरी रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाए तो किसानों को धरना-प्रदर्शन करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आंदोलन खत्म होने के बाद भी विभाग की यह सक्रियता बनी रहेगी, या फिर धरना समाप्त होते ही अवैध पाइपों और पानी की चोरी का मुद्दा दोबारा फाइलों में दब जाएगा?
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