वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले पीईआरएम यानी प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक रिव्यू मैनेजमेंट को लेकर बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी श्रम विभाग ने माइक्रोसॉफ्ट, एडोब, कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, विप्रो, एचसीएल टेक्नोलॉजीज और कैपजेमिनी को पीईआरएम कार्यक्रम से निलंबित करने की घोषणा की है। श्रम विभाग के अनुसार इन कंपनियों से जुड़े नए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे और लंबित आवेदनों की प्रक्रिया भी रोक दी जाएगी।
पीईआरएम अमेरिका में रोजगार आधारित स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। इसके तहत नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि संबंधित पद पर विदेशी कर्मचारी को स्थायी रूप से नियुक्त करने से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन, काम की परिस्थितियों या रोजगार के अवसरों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। पीईआरएम स्वीकृत होने के बाद ग्रीन कार्ड की आगे की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। हालांकि, पीईआरएम पर रोक का अर्थ यह नहीं है कि मौजूदा एच-1बी वीजा स्वतः रद्द हो जाएंगे।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट को निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया कि कंपनी ने पिछले वर्ष करीब 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, जबकि उसे करीब 6,300 एच-1बी वीजा की मंजूरी मिली और लगभग 3,000 ग्रीन कार्ड हासिल किए गए। वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार का उद्देश्य अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है। ये आरोप अमेरिकी प्रशासन की ओर से लगाए गए हैं; इन्हें स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
माइक्रोसॉफ्ट के मामले में प्रशासन ने पीईआरएम आवेदनों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। भारत टुडे की रिपोर्ट के अनुसार वेंस ने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट ने 3,682 पीईआरएम आवेदन दाखिल किए थे, जिनमें करीब 1,000 ऐसे पदों से संबंधित बताए गए जिन्हें अमेरिकी कर्मचारियों द्वारा छोड़े गए पदों के समान माना गया। दूसरी ओर, माइक्रोसॉफ्ट ने कहा है कि पिछले वित्त वर्ष में उसके करीब 80 प्रतिशत एच-1बी आवेदन मौजूदा कर्मचारियों के वीजा विस्तार या उनके दर्जे में बदलाव से संबंधित थे, न कि नए कर्मचारियों की भर्ती से।
इस फैसले का भारतीय आईटी पेशेवरों पर असर विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो और एचसीएल जैसी कंपनियां लंबे समय से अमेरिका के एच-1बी कार्यक्रम का इस्तेमाल करती रही हैं। पीईआरएम प्रक्रिया रुकने से उन विदेशी कर्मचारियों के लिए स्थायी निवास की दिशा में आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है, जिनकी ग्रीन कार्ड प्रक्रिया इस चरण पर निर्भर है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन के इस कदम से वर्तमान एच-1बी धारकों का वीजा सीधे समाप्त नहीं होता।
अमेरिकी श्रम सचिव कीथ सोंडरलिंग के अनुसार, इन कंपनियों ने वर्ष 2009 से अब तक करीब 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन किए और उन्हें 2.30 लाख से अधिक एच-1बी वीजा तथा एक लाख से अधिक स्थायी श्रम प्रमाणन मिलने की बात कही गई है। प्रशासन का आरोप है कि रोजगार आधारित वीजा व्यवस्था का दुरुपयोग हुआ है और इसका असर अमेरिकी कर्मचारियों पर पड़ा है। दूसरी ओर, भारतीय आईटी उद्योग संगठन नैसकॉम ने कहा है कि अमेरिका में भारतीय तकनीकी कंपनियों की एच-1बी पर निर्भरता पहले की तुलना में कम हुई है और अपेक्षाकृत कम कर्मचारी पीईआरएम के जरिये ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया में जाते हैं।
ट्रंप प्रशासन का यह कदम अमेरिकी सरकार की विदेशी कुशल कर्मचारियों और एच-1बी व्यवस्था पर बढ़ती सख्ती का हिस्सा है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि पीईआरएम पर लगी रोक कितने समय तक रहेगी और प्रभावित कंपनियों तथा उनके कर्मचारियों की लंबित ग्रीन कार्ड प्रक्रियाओं का आगे क्या होगा। अमेरिकी अधिकारियों ने रोक की निश्चित समय-सीमा नहीं बताई है।



