श्रीगंगानगर। शुक्रवार को महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर देश भर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए। दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने जा रहे सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिये जाने की जानकारी पीटीआई ने दी है। वहीं मुम्बई में भी कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध प्रदर्शन हुआ। इस बीच टीएन शेषण याद आ रहे हैं।
टीएन शेषण से पहले आने वाले चुनाव आयुक्तों के बारे में न तो पढ़ाया गया और न ही लोगों को आमतौर पर याद है। शेषण भले ही राष्ट्रपति नहीं बन पाये हों लेकिन उन्होंने चुनाव आयोग के बारे में जो प्रदर्शित किया था, उससे साफ था कि यह संवैधानिक पद भी पूर्व में राजनेताओं के पिंजरे का तोता रहा करता था।
शेषण ने चुनाव आयुक्त रहते हुए सुधार किये तो चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली देख राजनेताओं की नींद उड़ गयी थी और फटाफट चुनाव सुधार के नाम पर बिल लाया गया और चुनाव आयोग में एक के स्थान पर तीन आयुक्त बनाये गये।
अब दो आयुक्त जो केन्द्र सरकार द्वारा ही नियुक्त किये गये हैं, ने ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाये हैं। फाइलों में डॉ. सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने नोटिंग की है और एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाये हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस समय देश की जमात के निशाने पर हैं। देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने जा रहे सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिये जाने की जानकारी न्यूज एजेंसी ने दी है। प्रदर्शनकारियों ने इसे अंग्रेजी हुकूमत की याद ताजा होने की संज्ञा दी है।
क्यों नहीं हो पा रहा अमेरिका-भारत का टैरिफ मुक्त समझौता
दूसरी ओर संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौता शायद ही सिरे चढ़ पाये, उस दौरान तक भारत के व्यापारियों को ज्यादा टैरिफ का सामना निर्यात के दौरान करना पड़ सकता है, जैसा कि अमेरिकी सरकार के बयानों में सामने आ रहा है।
भारत सरकार ने न्यूजीलैण्ड के साथ बहुत ही कम समय लेकर मुक्त व्यापार समझौता कर लिया है और इसी तरह से कनाडा के साथ दिसंबर में यह एग्रीमेंट होने की पूरी संभावना है और संभव है कि ऐसा करने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ओंटारियो पर ज्यादा टैक्स लगाने का एलान कर दें।
इससे पहले जी-20 समिट दिसंबर माह की 14 व 15 तारीख को होनी है। समिट में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भी शामिल होने की पूरी संभावना है और वे इसके बाद कनाडा जा सकते हैं। कनाडा, यूरोप व भारत के साथ मुक्त व्यापार समझोता करना चाहता है क्योंकि संयुक्त राज्य ने ओंटारियो के लिए दरवाजे बंद कर दिये हैं और कनाडा पर दबाव बन रहा है कि वह नये बाजार तलाशे। इसी तलाश में भारत और यूरोप उसको ज्यादा आकर्षक बाजार नजर आ रहे हैं।
सवाल यह है कि भारत ने कनाडा, न्यूजीलैण्ड के साथ मुक्त व्यापार समझौते के लिए स्वयं को तैयार कर लिया है लेकिन अमेरिका के साथ पिछले दो साल से बातचीत चल रही है और यह समझौता नहीं हो पा रहा है, इसके पीछे मुख्य कारण क्या हैं?
निर्यात को कारोबार बनाने वाले व्यापारी भी मानते हैं कि अमेरिका दुनिया का सबसे आकर्षित करने वाला बाजार है। वहां पर परचेज पॉवर ज्यादा मजबूत है।
अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौते के लाभ को त्यागकर अगर भारत सरकार अन्य बाजार की ओर रुख करती है तो इसका अर्थ साफ है कि अमेरिका के साथ उसके आंतरिक संबंध ज्यादा मजबूत नहीं रहे। ट्रम्प ने यूरोप को चेतावनी दी है कि अगर कनाडा को यूरोप ने विशेष सहभागिता वाला देश का दर्जा दिया तो वह उस पर ज्यादा टैरिफ लगायेगा। इसी तरह की नीति भारत के मामले में भी ट्रम्प अपनाते हैं तो ज्यादा हैरानी नहीं होगी, क्योंकि बार-बार राष्ट्रपति यह आरोप लगाते हैं कि मोदी सरकार ने उनके देश का बहुत ज्यादा नाजायज फायदा उठाया है।
भारत की मौजूदा सरकार के रुख को देखकर लग रहा है कि वह किसी तरह से ट्रम्प सरकार के कार्यकाल को किसी तरह से पूरा करने के लिए समय व्यतीत कर रही है। सरकार को यह भी याद रखना होगा कि अभी नवंबर माह में ट्रम्प के निर्वाचन को दो साल होंगे जबकि दो साल का कार्यकाल अभी बाकी है और नवंबर माह में मध्यावधि चुनाव से फ्री होने के उपरांत ट्रम्प प्रशासन का ध्यान मोदी सरकार पर दबाव बनाने का ही रहेगा।



